
परिचय
नज़ला-जुकाम, सर्दी, नाक से पानी आना, नाक बंद होना और गले में कफ जैसी समस्याएँ मौसम में बदलाव के समय अक्सर देखने को मिलती हैं। आयुर्वेद में इन समस्याओं को समझते हुए व्यक्ति की दोष स्थिति, अग्नि, पाचन शक्ति, आहार और दिनचर्या आदि को ध्यान में रखा जाता है।
व्यक्ति के पित्त दोष, वात दोष और कफ दोष—इन तीनों में जब विकृति होने लगती है, तब इस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। आयुर्वेद इन बातों को ध्यान में रखते हुए शरीर की स्थिति के अनुसार चिकित्सा और आहार-विहार की व्यवस्था बताता है।
नज़ला-जुकाम जैसी परिस्थितियों में अगर ऐसी कोई समस्या है, गले में खराश, नज़ला-जुकाम या सर्दी जैसी समस्या है, तो इनके लिए लंघन पद्धति का प्रयोग पुराने चिकित्सा समय से किया जा रहा है। पहले के समय में लोग इस पद्धति का प्रयोग करते थे, लेकिन आजकल लोग इसे भूल गए हैं। अंग्रेजी दवाइयों को अपनाने लगे हैं और प्राकृतिक जीवन से मुँह मोड़ने लगे हैं। प्राकृतिक जीवन जीने के लिए उनके पास समय ही नहीं है।
लंघन पद्धति पुरानी पद्धति होती थी, समस्याओं के समाधान के लिए लोग इसका उपयोग करते थे। लेकिन आज Ayur Air हमारी साइट पर भी पुराने नुस्खे आज भी उपलब्ध हैं, जो आपको समस्याओं से समाधान में राहत दिलाने का कार्य करेंगे। हम आपको अभी पुरानी पद्धतियों और उसी आयुर्वेदिक वातावरण से जोड़ने के लिए पूर्ण प्रयास कर रहे हैं और करते रहेंगे। यह आपको आयुर्वेद में जीवन जीने की राह पर चलने के लिए प्रेरित करेगा और आपको आयुर्वेदिक जीवनशैली अपनाने में सहायता करेगा।
आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति में आवश्यकता के अनुसार लंघन का प्रयोग किया जाता था। लंघन का उद्देश्य शरीर और पाचन तंत्र पर जो अनावश्यक भार है, उसे कम करना था। इसके बाद रोगी की स्थिति और पाचन शक्ति के अनुसार उनको चावल के मांड का पानी, यानी दाल का पतला पानी, पतली खिचड़ी और हल्का भोजन दिया जाता था। दलिया वगैरह भी धीरे-धीरे आहार में शामिल किया जाता था।
इसलिए हम इस लेख में समझेंगे कि नज़ला-जुकाम, सर्दी और गले में कफ के समय लंघन पद्धति को किस प्रकार अपनाया जाता था, क्या खाया और क्या पिया जाता था, क्या विशेष ध्यान रखा जाता था, दाल का पानी किस प्रकार पिलाया जाता था, मांड का पानी किस प्रकार पिलाया जाता था और दलिया किस तरीके से तथा कब और कितने समय बाद खिलाया जाता था।
साथ ही, नाक में कौन-सी ऐसी आयुर्वेदिक औषधियाँ या तेल डाले जाते थे, इस विषय को भी समझेंगे।
आयुर्वेद में वर्णित स्वेदन या नस्य तथा पथ्य-अपथ्य की अवधारणाओं को भी समझेंगे।
लंघन पद्धति में हम पद्धति के साथ-साथ नाक में कौन-कौन से आयुर्वेदिक तेल डाले जाते हैं, इसका भी अच्छी तरह से वर्णन करेंगे, ताकि आपको पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को समझने में आसानी हो।
आयुर्वेद में लंघन पद्धति क्या है?
आयुर्वेद में लंघन पद्धति का अर्थ शरीर और पाचन तंत्र पर अनावश्यक भार कम करने वाली चिकित्सा पद्धति है। सिर्फ निर्जल या भूखा रहना ही लंघन पद्धति समझना नहीं चाहिए।
लंघन का प्रयोग व्यक्ति की अग्नि, पाचन शक्ति, दोष और रोगी की अवस्था को देखकर किया जाता है।
आयुर्वेद में जब व्यक्ति की पाचन शक्ति में भारीपन, कमजोरी जैसी स्थिति होती है, तो उन्हें हल्का आहार दिया जाता है।
और साथ ही नाक में विभिन्न प्रकार की जो औषधियाँ या तेल डाले जाते हैं, उनके बारे में भी हम बताएँगे कि किस प्रकार से कौन-सा तेल डालना है। तेल डालकर नस्य भी किया जाता है।
रोगी को कई प्रकार के मांड, चावल का मांड और दाल का पानी तथा दलिया जैसी हल्की आहार सामग्री खिलाई जाती है।
ऐसी ही समस्याओं के समाधान के लिए पुराने से पुराने जुकाम और सर्दी जैसी समस्याओं में इस पारंपरिक पद्धति का उपयोग किया जाता रहा है।
नज़ला-जुकाम, सर्दी और गले में कफ में आयुर्वेदिक लंघन पद्धति कैसे करें? पूरी विधि, आहार और सावधानियाँ
सबसे पहले लंघन की शुरुआत
सबसे पहले रोगी की स्थिति को देखा जाता है।
यदि भूख कम है, शरीर में भारीपन है और भोजन ठीक से नहीं बच रहा है, रोगी का तुम्हारी भोजन को रोक कर हल्का आहार रखा रख दिया जाता है। यानी आप दाल का पानी पी सकते हो। दाल में आप से ना नमक डालकर उसे करें। बाकी इसमें मिर्ची वगैरह ना डालें। बस नमक का दाल का पानी होना चाहिए। उबली हुई दाल का पानी यानी मूंग की दाल का पानी उपयोग कर सकते हो।
लंघन करती है नहीं कि आपको भूखा रखा जाए। भूखा नहीं रखा जाता है, कुछ ना कुछ तरल दिया जाता है।
लगभग शुरुआत में यह प्रोसेस तीन दिन तक की जाती है।
और जब प्यास लगी है तो उसे गुनगुना पानी पिलाया जाता है रोगी को।
तीन दिन के बाद चावल के मांड का पानी पिलाया जाता है रोगी को।
और जब प्यास लगती है उसी दिन में तो वह पानी की गुनगुने पानी का उपयोग कर सकता है।
और इसमें इस लंघन पद्धति आयुर्वेदिक पद्धति में
नाक में षड्बिंदु ऑयल जैसे डाले जाते हैं या बादाम रोगन जैसे ऑयल और कई आयुर्वेदिक नाक में डाले जाते हैं।
रोगी को 4 दिन तक मांड का पानी पिलाया जाता है कि उसका पेट भरा रहे। जब रोगी को ज्यादा ही आवश्यकता होती है तब लाया जाता है, जब ज्यादा ही भूख लगती है। इसमें खाली पेट रहना अनिवार्य है इस लंघन पद्धति में।
फिर भूख लगने पर रोगी को दलिया खिलाया जाता है
या नहीं, दलिये का पानी, नॉर्मल दलिया, पतला—यह प्रोसेस भी लगभग चार दिन तक करनी होती है। और रोगी को प्यास लगती है तो गरम गुनगुना पानी पिलाया जाता है।
भरपेट नहीं खिलाया जाता है, ना ही पिलाया जाता है। इस दलिये के पानी को ज्यादा ही जरूरत होती है जब यानी और व्यक्ति एक तरह का लंघन हो जाता है। व्यक्ति की बॉडी काम करना है छोड़ सी देती है या नहीं, सुस्ती आ जाती है बॉडी में, उसे उतना ही खिलाया या पिलाया जाता है।
और नाक में षड्बिंदु ऑयल, बादाम रोगन जैसे और कई आयुर्वेदिक ऑयल डाले जाते हैं और साथ ही गर्म पानी की भाप भी नाक में दी जाती है, कपूर डालकर, आयुर्वेदिक चिकित्सक के अनुसार।
फिर इसके बाद पतली खिचड़ी दी जाती है
रोगी को लगभग तीन दिन तक और वही प्रोसेस रहती है। नाक में ऑयल डालना और दिन में अगर प्यास लगती है तो गुनगुना पानी पिलाया जाता है।
एंड लास्ट में धीरे-धीरे सामान्य हल्का भोजन दिया जाता है
रोगी को जब भूख और पाचन शक्ति सामान्य होने लगे, तब धीरे-धीरे सामान्य हल्के भोजन की ओर वापस आया जाता है। एकदम से खाना वगैरह नहीं खिलाया जाता है और एकदम से नाक में ऑयल वगैरह नहीं डाला जाता है।
नाक बंद होने पर सहायक उपाय
कई आयुर्वेदिक ऑयल और बादाम रोगन जैसे ऑयल डाले जाते हैं।
नस्य के बारे में
नस्य प्रक्रिया में अगर आप नाक की नासिका में ऑयल डालते हैं, नस्य में डाल दें तो सावधानीपूर्वक आयुर्वेदिक डॉक्टर सही सलाह लें। हमसे सलाह ले सकते हो आप। Ayur Air Team आपके लिए तत्पर है।
इस पूरी प्रक्रिया में ध्यान देने योग्य बात
लंघन के दौरान शरीर को कमजोर करने की वजह पाचन पर अनावश्यक भार कम करना उद्देश्य होना चाहिए। जैसे-जैसे भूख और पाचन शक्ति वापस आ जाए, वैसे-वैसे हल्के भोजन की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए।
सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, कमजोरी, पानी की कमी और बिगड़ते लक्षण हैं तो केवल लंघन जैसी स्थिति को ना अपनाएं और आयुर्वेदिक डॉक्टर से तुरंत सलाह लें।
सावधानियाँ
जब आप लंघन में दिए उपयोग कर रहे हो तब जो भी दाल का पानी लें या चावल के मांड का पानी लें, दलिया का पानी लेकर उसमें मिर्ची और चिकनी वस्तुएँ यानी चिकनी चीज वगैरह न डालें।
बनाते समय कुछ खाएँ नहीं। जो इस विधि में बताएँ, उसी तरीके से उपयोग करें लाभ पाने के लिए।
आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में इस लंघन प्रक्रिया को अपनाएँ।
नोट
मूंग की दाल का पानी — 3 दिन
चावल का मांड का पानी — 4 दिन
दलिया का पतला पानी — लगभग 4 दिन
पतली खिचड़ी — 3 दिन
फिर सामान्य हल्का भोजन।
चेतावनी
लंघन अपनाते समय आप कूलर, फ्रिज की छाया से बचें। कूलर की ठंडी हवा से बचें। इसी में न रहें और आप सामान्य नॉर्मल हवा चल रही हो, यानी अंदर जहाँ पर डायरेक्ट हवा नहीं लग रही हो आपकी बॉडी को, वहाँ पर रहना है। आपको इस लंघन पद्धति को अपनाते समय तेज हवा में ही निकलना है।
क्या खाएँ, क्या नहीं खाएँ
ठंडी वस्तुओं का उपयोग करें। खट्टे पदार्थों का उपयोग करें।